जिन्होंने अपने वतन को सितम की इंतिहा तक चाहा हो, इश्क़ की तर्ज़ पर इंक़लाब लिख डाला हो। ऐसे दीवाने भगत सिंह की जयंती पर, उनकी याद में, यह अल्हड़ लेखक आपसे कुछ दिली बातें करना चाहता है।
हालाँकि मेरे धैर्य ने अभी अभी ख्यालों का रास्ता इख़्तियार करना शुरू ही किया है। फिर मैं उस विचारक, चिंतक और वीर भगत सिंह पर क्या ही लिखूंगा। मगर हाँ, भगवे रंग की बली चढ़े उनके बसंती चोले की वेदना को समझने की कोशिश तो कर ही सकता हूँ।
और इस कोशिश के दायरे आपसे होकर भी गुज़रें, तो बेहतर!
भगत सिंह वो नाम है जिसकी खनक भारत के हर बच्चे-बुज़ुर्ग के कानों में कभी ना कभी तो ज़रूर गुंजी होगी। मैं भी उन लोगों में से ही हूँ, जो भगत सिंह को बेहद करीब से तो नहीं जानते मगर उनका ज़िक्र, बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है।
मैं उन्हीं लोगों में से हूँ जो भगत सिंह पर बनी फिल्मों में उनके 116 दिनों के उपवास के दौरान उनकी लोहे की खाल देख कर रोने लगते हैं। पर देखिए ना, उनके आज़ाद भारत में कुछ सियासी दल, मंचों पर, भीड़ से घिरे, भूखे रह कर अपने सियासत की किस्मत-आज़माई करते हैं। मुद्दा अनशन का नहीं, बग़ावत का नहीं ; मुद्दा है नियत का।
एक दफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकर्म “मन की बात” में युवाओं को भगत सिंह जैसा कैसे बनें, इस बात पर चर्चा कर रहे थे। उन्होंने उनके देश प्रेम, टीम वर्क जैसी बातों पर गौर करवाया।
मगर वो यह बताना भूल गए कि भगत सिंह को जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर कितनी आपत्ति रही है। वो यह भी बताना भूल गए कि भगत सिंह ने समाज के कमज़ोर वर्ग पर होते आए ज़ुल्म को हमेशा गलत ठहराया है।
बहरहाल बात करते हैं, भगत सिंह के उस सोच की जहाँ वो युवाओं को किसी भी प्रकार का सुधार लाने के काबिल समझते हैं। बुज़ुर्ग तो विचारक हैं, मगर सुधार मात्र विचार करने से नहीं, युवकों के बेख़ौफ़ सही कदम उठाने से आता है; उनके अनुभव, परिश्रम, और बलिदान से आता है।
पर शायद यह सोचते हुए उन्हें यह इल्म ना था कि उनके आज़ाद भारत का युवा समस्याओं का इतना आदि हो जायेगा कि वो एक वक़्त आकर रेप और खुदखुशी जैसी मार्मिक ख़बरों को मामूली समझ, उन्हें दरकिनार करने लगेगा। वो पत्रकारिता के हाल पर तंज तो कसेगा मगर बहु ने लैपटॉप सूखने के लिए रस्सी पर टांगा की नहीं , उसकी इसी में दिलचस्पी होगी। वो हंगामा खड़ा तो कर देगा मगर उसकी ज़िम्मेदारियों से भाग जायेगा। वो रात भर बैठ कर ट्विटर, इंस्टाग्राम पर लड़कियों का शोषण करेगा और शाम को महिला सुरक्षा पर बहस।
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और जाते हुए अगर मैंने उस युवा वर्ग का ज़िक्र नहीं किया जो सीने में क्रांति की मशाल लिए चल रहा है, तो इन्साफ का तराजू हल्का मालूम होगा। उस युवा वर्ग का ज़िक्र नहीं किया जो गलत के खिलाफ सड़कों पर उतर आता है, पुलिस के डंडों की चोट से नहीं डरता। ट्रैन और बसों में आग लगा देता है। खुली सड़क पर गोली चला कर भाग जाता है। दंगों को भड़काता है। बिना समस्या को जाने, भीड़ का हिस्सा बन, मोर्चे में शामिल हो जाता है। तो मेरा यह लेख अधूरा रह जायेगा।
उस शहीद-ए-आज़म को कहाँ खबर थी की यह दिन भी आएगा।
मेरे ख्याल से मामला बड़ा गंभीर और सीधा है। उस दौर में युवाओं के पास एक बड़ा लक्ष्य था। देश आज़ाद कराने का लक्ष्य। आज हम लोग अपने-अपने घरों में बैठ कर, गरम चाय के धुंए में खुद की शक्ल ढूंढते हुए, किसी ना किसी को कोसते हुए, अपने बीहड़ ख्यालों में, खुद के सामर्थ्य को खोने लगे हैं।
तो जब लक्ष्य ही बड़ा नहीं तो जंग क्या बड़ी होगी , और जब जंग ही नहीं बड़ी तो फतह कौन सा किला होगा ?
इस महामारी ने हम लोगों को कई मूल्यों पर चिंतन करने पर विवश कर दिया है। शायद मानवता को इसी की दरकार थी।
अंत में अपनी बात को मैं दुष्यंत कुमार की कविता की एक पंक्ति से अलंकृत करना चाहूंगा –
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए”
क्यूंकि आवाज़ उठाने से कहीं महत्वपूर्ण है,आवाज़ का सही तरीके से उठना। और उससे भी अहम, आवाज़ का सही जगह पर पहुंचना है।